आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच संघर्ष खत्म, व्लादिमीर पुतिन के पहल के बाद बनी सहमति

आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच संघर्ष खत्म, व्लादिमीर पुतिन के पहल के बाद बनी सहमति


आर्मीनिया और अजरबैजान ने कहा कि वे नागोरनो-काराबाख में संघर्षविराम पर सहमत हो गए हैं. Photo:AP

आर्मीनिया और अजरबैजान ने कहा कि वे नागोरनो-काराबाख में संघर्षविराम पर सहमत हो गए हैं. Photo:AP

आर्मीनिया (Armenia) और अजरबैजान (Azerbaijan) ने कहा कि वे नागोरनो-काराबाख में संघर्षविराम पर सहमत हो गए हैं और यह शनिवार दोपहर से शुरू होगा. आर्मीनिया और अजरबैजान के विदेश मंत्रियों के बीच यह वार्ता रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) के निमंत्रण पर हुई.

मास्को. आर्मीनिया (Armenia) और अजरबैजान (Azerbaijan) ने कहा कि वे नागोरनो-काराबाख में संघर्षविराम पर सहमत हो गए हैं और यह शनिवार दोपहर से शुरू होगा. दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने एक वक्तव्य में कहा कि संघर्षविराम का मकसद कैदियों की अदला बदली करना तथा शवों को वापस लेना है. इसमें कहा गया कि अन्य बातों पर सहमति बाद में बनेगी. आर्मीनिया और अजरबैजान के विदेश मंत्रियों के बीच यह वार्ता रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) के निमंत्रण पर हुई.  इस लड़ाई में अब तक कम से कम 200 लोगों की जान गई. इससे पहले नागोर्नो-काराबाख़ में साल 2016 में भी भीषण लड़ाई हुई थी जिसमें 200 लोगों की मौत हुई थी.

रूस की पहल पर 10 घंटे तक चली वार्ता

इस घोषणा से पहले मास्को में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की देखरेख में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच 10 घंटे तक वार्ता हुई थी. लावरोव ने कहा कि यह संघर्षविराम विवाद निपटाने के लिए वार्ता का मार्ग प्रशस्त करेगा.

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नागोरनो-काराबाख क्षेत्र में 27 सितंबर को दोनों देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ था, यह क्षेत्र अजरबैजान के तहत आता है लेकिन इस पर स्थानीय आर्मीनियाई बलों का नियंत्रण है. यह 1994 में खत्म हुए युद्ध के बाद इस इलाके में सबसे गंभीर संघर्ष है. इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है.

पहले हुए युद्ध् में 10 लाख लोग विस्थापित हुए थे

बता दें कि नागोर्नो-काराबाख़ करीब साढ़े चार हज़ार वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला ये एक पहाड़ी इलाका है. इस इलाके में पारंपरिक रूप से आर्मीनियाई मूल के ईसाई और तुर्की मूल के मुसलमान रहते हैं. ये पहले सोवियत संघ के ज़माने में ये अज़रबैजान के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी इलाका था. अंतरराष्ट्रीय रूप से इस इलाके को अज़रबैजान का ही हिस्सा माना जाता है लेकिन इसकी बहुसंख्यक आबादी आर्मीनियाई मूल के लोग हैं. साल 1988-94 के दौरान हुए युद्ध में तकरीबन दस लाख लोग विस्थापित हुए थे और 30 हज़ार लोग मारे गए थे. तुर्की खुलकर अज़रबैजान का समर्थन करता है. आर्मीनिया में रूस का एक सैनिक अड्डा है.





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