पढ़ाई लिखाई से बंगाल में भोजपुरी के लोग के जीवन में केतना बदलाव आइल

पढ़ाई लिखाई से बंगाल में भोजपुरी के लोग के जीवन में केतना बदलाव आइल


भोजपुरी बोले वाला लोग बंगाल में मेहनत मजूरी क के जीवन चलावे गइल रहे, लेकिन आज पढ़ाई लिखाई से भोजपुरी समाज के बहुत बड़ हिस्सा के जीवन में बदलाव आ गइल बा. भोजपुरी समाज के ये सफल यात्रा पर एक नजर.


  • News18Hindi

  • Last Updated:
    October 17, 2020, 1:43 PM IST

ढ़ाई लिखाई माने कि शिक्षा कौनो समाज के बढावे खातिर केतना जरूरी होला ई बंगाल के भोजपुरी समाज के पिछला 50-60 साल के विकास यात्रा पर नजर डलले पे साफ दिखाई दे जाई. ऊहवा के भोजपुरिया बोले वालन परिवार के नौजवानन में पढ़े लिखे क चसक जहिया से जागल ह समझी कि उनकर भागे जाग गईल. पढ़ाई लिखाई त सबही क भाग जागेवेला चाहे केहू कौनो समाज कौनो परिवार क होखे लेकिन बंगाल के भोजपुरिया समाज क भाग जगले क माने कुछ औरे ह. पढाई लिखाई से बंगाल में 60 के दसक तक मुड़ी गोत के चले वाला भोजपुरिया समाज के नवका पीढ़ी 80 के दसक आवत आवत सीना तान के चले लागल. कहे क माने ई है कि जेकर बंगाली भाई लोगन के आगे बोली न निकले उन कर बच्चा सब पढ़ लिख के मन से एतना मजबूत हो गइल सब कि अब रास्ता घाट…. बस ट्रेन कहिओं आपस में आपन बोली बोले में तनको न लजानन सब.

पहिले बंगाली भाई लोगन के आगे आपन बोली बोले क त हिम्मते न होखे हिन्दी बोले में भी जइसे प्राने निकल जाए. ईहे हाल बंगला न बोले वाला बिहार के दूसरो समाज के लोगन के रहे. उनका सबके चाल ढाल में भी पढ़ले लिखले से बहुते ज्यादा सुधार होईल ह लेकिन भोजपुरिया समाज क नवका सबमें त गजबे ठसक देखाई पड़े ला. पढल लिखल भोजपुरिया जवान सबका सामने आपस में आपन बोली बोले में तनिको न सकुचाला. एक त आपन परदेस ऊपर से घरे में सुरए से पढाई लिखाई क वातावरन रहे क असर ई होईल कि बंगाली समाज अपना के सबका से ऊपर माने लागल. एकरा पीछे सबसे बड़ कारन ई ह कि ई समाज में शिक्षा के ले के सुरुए से एगो अलगे सोच दिखाई पड़े ला. एकरा चलते ई समाज के लोग आजादी के पहिले से ही पढ़े लिखे वाला हर क्षेत्रे में आगे चले लागल. ओकर नतीज ई होईल कि सरकारी नौकरियन में भी इहे लोग अधिक दिखाई लागे लगल.

बाकिया समाज के लोग पिछुआए लागल. शिक्षा के ले के ई समााज आजादी के पहिले से ही जाग गईल रहल… एकर सबसे बड़ कारण सायद अंग्रेजन क सबसे पहिले कलकत्ता में आइके बसल ही होखे. चाहे जौने कारन होखे लेकिन बंगाली भाई लोग अपना आगा केहू के कुछ समझते ना रहे. उनका सबका रौब में रोजी रोटी कमाए घर बार परिवार छोड़ के सैकड़ो मील दूर आइल बिहार के मजदूर कामगार भाई लोग आ जाए. एतना दूर गईल भाई लोगन के भी पूरा धयान कमाई पर रहे. एकरा चलते न तो आपन परिवार ठीक से पाले पोसे पर ही धयान देहलन लोग आ न त आपन बच्चन के पढ़ावे लिखावे के बारे में ही कबहूं सोचलन. अइसे बेसी लोगन क परिवार त गांवे पर रहे आ जे अपना साथ रखबो करे सबके धयान दू पैसा कमाइये पर रहे. कमाई भी कौने एतना न रहे कि बाल बच्चन के बढ़िया से पाल पोस सकें. उ जमाना में जे आपन पेट काट के बच्चन के पढ़ा लेहिलस समझ लेही कि उनकर भागे जाग गईल. लेकिन अइसन कर पावे वाला बहुते कम लोग रहे तब.

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अब माने पिछला तीसन साल से आस्ते आस्ते ई हालत बदले लागल. जब इन सब बिहारी उहो भोजपुरिया कामगार भाइयन के लाइका लइके स्कूल कालेज जाए लगने त भरल समाज में उहो बंगाली लोगन के बीच मुंहों खुले लागल. ना त पहिले बंगाली भाई लोगन के सामने बोलिए न निकले. ई त शिक्षा पावे के ही कमाले ह कि भोजपुरी भी आपन रंग दिखावे लागल. अइसन न रहे कि पहिले भाई लोग अपना में आपन बोली ना बोलें …. लेकिन ट्रेन बस में बेख्याली से भी मुंह से आपन बोली निकल गइले पर तुरते डंटा जाए लोग…. क्या बोलता है… चुपचाप शांति से बइठो. अधिका से अधिक भोजपुरिया भाई लोग कलकत्ता के नियरे हुगली नदी के दोनों तीरे हबड़ा, हुगली और 24 परगना जिला में बसल ह. हुगली नदी के तीरे ए से कि नदी के दोनों पार ही चटकल, सूताकल आ दूसर कल कारखाना बनन ह. आ ए में मसीन चलावे वालन कामगार सब बिहार आ पूर्वांचल के ही रहे.

सबका के कबहूं न कबहूं कौनो न कौनो काम से कलकत्ता जाए के पड़े. कलकत्ता जाए क साधन ट्रेन आ बस रहे. अउर ट्रेन आ बस पर चढ़े के माने रहे बंगाली भाई लोगन क अइंठ से न झेलल. आ एसे बचे क एके उपाय रहे मुंह बंद करके चुपचाप कलकत्ता जा अउर आपन काम खतम करिके चुपचाप घरे चल आवा. अउर कउनो जरूरी बात होखे त आस्ते आस्ते आपसे में बतियावा, अइसे कि केहू अउर के सुनाइए न पड़े. इ सब अनपढ़ होला के चलते रहे. लेकिन इ सब अनपढ़ कामगरन के बच्चा लोग पढाई लिखाई के चलते आपन हक अउर देश क नियम कानून ठीक से समझे बूझे लागल. एकरा चलते अब उ केहू से न त दबे के तैयार रहे आ न त केहू के रोब सहे के. सायद दिमाग में इहो रहे कि उनकर बाप दादा के बहुते सतावल गईल रहे. पढ़ल लिखल जवान पीढ़ी के मन में कौनो किसम के डर भय जब खतम हो गईल त उ अब रास्ता घाट… ट्रेन बस…कालेज आफिस जब जगह अपना भाई लोगन से अपने भाषा में बोले बतियावे लागल.

ई लोगन के इहो बात के चिंता न रहे कि के का बोली आ के क सोचत ह. मजे क बात इ ह कि बंगाल क मूल समाज भी इ बात बहुत जलदी समझ गइल कि पढल लिखल बच्चन पर रोब झाड़ल अब हंसी ठट्ठा नाही ह. लेकिन दिमाग में जउन चीज सालन से बइठल ह उ एतना जलदी कइसे खतम होई. से उ लोग अब अपने में फुसफुसाए लागल कि… इ सब केतनो लिख पढ़ लें लेकिन इनकर देहाती पन कबहूं ना जाई. बंगाल बिहार में सुरूए से ही रार रहे. बंगाली भाई लोग हिंदी बोले वाले सबके ( मारवाड़ियन के छोड़ के ) बिहारी ही बुलावेलन. भोजपुरी अउर यूपी बिहार क दोसर बोली बोले वालन सब लोग उन सबका नजर में बिहारी रहन. केहूं अगर टोक देबे कि हम बिहार के नाही यूपी क रहे वाला हईं त कहें बोलचाल भाषा त एक्के ह चाहे जहां क रहा . हां अगर केहूं कह दे कि हम त कासी क हईं … तब तनी मनी इज्जत पानी मिल जाए, उहों बूढ़ पुरनियन से. काहे से कि उन कर बूढ़ पुरनिया मोक्ष पावे खातिर शिव नगरिया कासी ही आवल चाहत रहें.

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कासी के छोड़ के केहूं भी ‘बिहारी’ के खातिर उन सबका मन में कौनो इज्जत न रहे. उ सब आपस में इन सबही के छातू कह के भी बोलावत रहें. छातू माने सतुआ खाए वाला. लेकिन पढाई लिखाई से समाज में केहू क इज्जत कइसे बढ़ेला अउर कइसे ओकर खान पान … रहन सहन भी इज्जत पावे लगेगा… सतुआ एकर सबका ले बड़ उदाहरण ह. शिक्षित भोजपुरियन के साथे रह के बंगाली संगी साथिन के सतुआ के गुन समझ में आवे लागल. गरमी के दिन में अब भाई लोग फुटपाथ पर बिहारी भाइयन के दोकान पर मिले वाला सतुआ क सेवन बिना लाज संकोच करेला. मुढ़ी चनाचूर और झालमुढ़ी खाए वाला भाई लोग अब भूजा अ चूड़ा चना भी खूब चाव से खाएला … जबकि पहिले इहे भाई लोग आपन खानपान – रहनसहन, पहिनावा अउर संस्कृति पे एतना इतराये कि ओकरा आगे केहू के कुछऊ न समझे. लेकिन शिक्षा के चलते खुलल दिमाग क बत्ती कौनो भी समाज क भाग के बदल देला. बंगाल क बिहारी अउर पूर्वांचली समाज में 30 – 40 साल के भीतरे परिवर्तन एकर अच्छा उदाहरण ह.





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