Nehru and Modi: Making friends with China makes them even more greedy | नेहरू और मोदी : चीन संग मेलजोल रखना बनाता है और भी लालची

Nehru and Modi: Making friends with China makes them even more greedy | नेहरू और मोदी : चीन संग मेलजोल रखना बनाता है और भी लालची



नई दिल्ली, 21 अक्टूबर (आईएएनएस)। चीन की ओर से भारत पर हमला 58 साल पहले 20 अक्टूबर, 1962 को हुआ था। चीन ने जब भारत पर सुनियोजित हमला किया था, तब देश इसके लिए तैयार नहीं था और उसे युद्ध में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। यह इस तथ्य के बावजूद हुआ कि युद्ध से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एक साम्यवादी चीन के समर्थन में थे, जो विश्व स्तर पर तब भी विश्वसनीय नहीं था और इस समय भी नहीं है।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो चीन के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखने के लिए अपने रास्ते से बाहर चले गए, जिसके परिणामस्वरूप भारत खराब गुणवत्ता वाले चीनी सामानों के लिए एक विशाल बाजार बन रहा है। एक बार फिर, कम्युनिस्ट देश ने एक सावधानीपूर्वक योजना को अंजाम दिया और उसने भारतीय सीमा में प्रवेश किया। इतना ही नहीं, अब वह युद्ध में जाने की धमकी भी दे रहा है।

हालांकि भारत ने कई सबक सीखे हैं, मगर यह एक महत्वपूर्ण चीजें सीखने के लिए बहुत तैयार नहीं लगता है। विस्तारवादी नीतियों वाला चीन भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कमजोर करने में लगा रहता है और भारत के शत्रु माने जाने वाले देशों के साथ गठजोड़ करता है। इतना ही नहीं, यह आतंकवादी संगठनों का समर्थन करता है और संयुक्त राष्ट्र नामित आतंकवादियों को ढाल देता है। भारतीय राजनीतिक नेतृत्व अभी भी इस बिंदु से चूक रहा है और वह दोस्त और दुश्मन के बीच अंतर नहीं कर पा रहा है।

हालांकि 1962 के भारत और 2020 के भारत के बीच समानताएं यहां समाप्त होती हैं। पीएलए के सैनिकों ने भले ही वास्तविक नियंत्रण रेखा (पीएलए) से लगते लद्दाख के क्षेत्र में यथास्थिति बदलने के लिए प्रयास किए हैं, मगर इसके साथ ही चीन इस बात पर भी गौर कर रहा है कि क्या उसने भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करके गलती तो नहीं कर दी है।

इस साल 15 जून को चीन के सैनिक पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय जवानों के साथ हिंसक झड़प में शामिल हुए तो उसने भारत की तुलना में अपने कहीं अधिक सैनिकों को खो दिया। जैसे कि अगर चीन युद्ध करता भी है, तो उसे यह भी पता है कि भारत अब हिंदी-चीनी भाई भाई जैसे नारे को नहीं मानता, जैसे कि वह इसे पहले मान रहा था।

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (एमपीआईडीएसए) के रिसर्च फेलो और शौर्य चक्र पुरस्कार पाने वाले कर्नल डी. पी.के. पिल्ले का कहना है, 2020 वर्ष 1962 से अलग है, क्योंकि हम वास्तव में चीन के सामने सीना तानकर खड़े हैं। हम काउंटर अटैक करने के लिए जल्दी से अपने सैनिकों को मुकाबले के लिए तैयार करने में सक्षम हैं। हमने समय पर मित्र देशों के साथ गठजोड़ करना शुरू कर दिया और हम सार्वजनिक रूप से इन गठबंधनों की घोषणा करने से भी नहीं कतराए। हमारे पास चीनी पीएलए से बेहतर सैन्य क्षमताएं भी हैं।

ऐसा लगता है कि भारत ने पिछली कई गलतियों से सीखा है। यह पहले से ही अपने हवाई ठिकानों को सक्रिय कर चुका है, जिसका इस्तेमाल 1962 के युद्ध में नहीं किया था। चीनी सीमा के करीब हिमालय पर विभिन्न वायुसेना के जेट विमान गरज रहे हैं। 1962 में भारतीय वायुसेना को सक्रिय नहीं करने का निर्णय ही था कि हम युद्ध हार गए। ऐसा माना जाता है कि तत्कालीन अमेरिकी राजदूत ने नेहरू को वायुसेना का उपयोग न करने की सलाह दी। सिर्फ अमेरिकियों ने ही नहीं, नेहरू के एक ब्रिटिश सलाहकार ने भी यही गलत सलाह दी।

पिल्ले का कहना है कि वर्तमान में हमारी सीमा पर डटे सुरक्षा बलों को बेहतर कपड़े मिले हुए हैं। वे ऊंचाई वाले स्थानों पर तैनात हैं और उनके पास जरूरत के सामान का पर्याप्त स्टॉक भी हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत अब एक गरीब राष्ट्र नहीं है, जैसा कि वह 1960 के दशक में था।

वह कहते हैं, हालांकि हम हार गए, मगर 1962 के युद्ध का एक सकारात्मक नतीजा भी रहा। इसने पाकिस्तान के खिलाफ 1971 की जीत और बांग्लादेश के निर्माण को जन्म दिया। हमने चीन को पहले से कहीं बेहतर तरीके से समझना शुरू कर दिया।

उन्होंने कहा कि हमें यह भी पता चला कि चीन के साथ शांति, सांत्वना या दिलासा देने वाली बातों से कोई मदद नहीं मिलती है, क्योंकि विस्तारवादी चीन की अपने सीमाओं का विस्तार करने की भूख कभी खत्म ही नहीं होती है।

वर्तमान समय ऐसा है कि चीन भारत की ताकत को समझने के साथ ही कई तरह की अन्य चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। चीन के वुहान प्रांत से फैले कोरोनावायरस महामारी के कारण उसे कई ताकतवर देशों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। चीन के प्रति वैश्विक रुख इसलिए भी आक्रामक है कि वह भारत के खिलाफ आक्रामकता दिखा रहा है, हांगकांग में लोगों के लोकतंत्र बहाली की आवाज को दबा रहा है, दक्षिण चीन सागर में दादागीरी दिखा रहा है, ताइवान और तिब्बती लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर रहा है और ऐसे ही अन्य कई उदाहरण शामिल है। यही नहीं, अगर आर्थिक मोर्चे की बात करें तो उसके अमेरिका के साथ भी व्यापारिक रिश्ते खराब हुए हैं और अब भारत भी आत्मनिर्भर बनने की राह पर चलते हुए चीन से आयात कम से कम करना चाह रहा है।

कुल मिलाकर 1962 की तुलना में सीमा पर चीन का कड़ा मुकाबला करने के लिए भारत कहीं बेहतर स्थिति में है।

(यह आलेख एक व्यवस्था के तहत इंडियानैरेटिव डॉट कॉम के सौजन्य से)

एकेके/एसजीके



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